Satsang, Women's Voices

आनंदीबाई की दृढ़ श्रद्धा


एक पंजाबी महिला का नाम था आनंदीबाई। देखने में तो वह इतनी कुरूप थी कि देखकर लोग डर जायें। उसका विवाह हो गया। विवाह से पूर्व उसके पति ने उसे नहीं देखा था। विवाह के पश्चात् उसकी कुरूपता को देखकर वह उसे पत्नी के रूप में न रख सका एवं उसे छोड़कर उसने दूसरा विवाह रचा लिया।

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आनंदी ने अपनी कुरूपता के कारण हुए अपमान को पचा लिया एवं निश्चय किया कि ‘अब तो मैं गोकुल को ही अपनी ससुराल बनाऊँगी।’ वह गोकुल में एक छोटे से कमरे में रहने लगी। घर में ही मंदिर बनाकर आनंदीबाई श्रीकृष्ण की मस्ती में मस्त रहने लगी। आनंदीबाई सुबह-शाम घर में विराजमान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ बातें करती… उनसे रूठ जाती… फिर उन्हें मनाती…. और दिन में साधु-सन्तों की सेवा एवं सत्संग-श्रवण करती। इस प्रकार उसके दिन बीतने लगे।

एक दिन की बात हैः

गोकुल में गोपेश्वरनाथ नामक जगह पर श्रीकृष्ण-लीला का आयोजन निश्चित किया गया था। उसके लिए अलग-अलग पात्रों का चयन होने लगा। पात्रों के चयन के समय आनंदीबाई भी वहाँ विद्यमान थी। अंत में कुब्जा के पात्र की बात चली। उस वक्त आनंदी का पति अपनी दूसरी पत्नी एवं बच्चों के साथ वहीं उपस्थित था। अतः आनंदीबाई की खिल्ली उड़ाते हुए उसने आयोजकों के आगे प्रस्ताव रखाः

“सामने यह जो महिला खड़ी है वह कुब्जा की भूमिका अच्छी तरह से अदा कर सकती है, अतः उसे ही कहो न ! यह पात्र तो इसी पर जँचेगा। यह तो साक्षात कुब्जा ही है।”

आयोजकों ने आनंदीबाई की ओर देखा। उसका कुरूप चेहरा उन्हें भी कुब्जा की भूमिका के लिए पसंद आ गया। उन्होंने आनंदीबाई को कुब्जा का पात्र अदा करने के लिए प्रार्थना की।

श्रीकृष्णलीला में खुद को भाग लेने का मौका मिलेगा, इस सूचनामात्र से आनंदीबाई भावविभोर हो उठी। उसने खूब प्रेम से भूमिका अदा करने की स्वीकृति दे दी। श्रीकृष्ण का पात्र एक आठ वर्षीय बालक के जिम्मे आया था।

आनंदीबाई तो घर आकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे विह्वलता से निहारने लगी एवं मन-ही-मन विचारने लगी कि ‘मेरा कन्हैया आयेगा… मेरे पैर पर पैर रखेगा…. मेरी ठोड़ी पकड़कर मुझे ऊपर देखने को कहेगा….’ वह तो बस, नाटक में दृश्यों की कल्पना में ही खोने लगी।

आखिरकार श्रीकृष्णलीला रंगमंच पर अभिनीत करने का समय आ गया। लीला देखने के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुए। श्रीकृष्ण के मथुरागमन का प्रसंग चल रहा थाः

नगर के राजमार्ग से श्रीकृष्ण गुजर रहे हैं… रास्ते में उन्हे कुब्जा मिली….

आठ वर्षीय बालक जो श्रीकृष्ण का पात्र अदा कर रहा था उसने कुब्जा बनी हुई आनंदी के पैर पर पैर रखा और उसकी ठोड़ी पकड़कर उसे ऊँचा किया। किंतु यह कैसा चमत्कार ! कुरूप कुब्जा एकदम सामान्य नारी के स्वरूप में आ गयी !! वहाँ उपस्थित सभी दर्शकों ने इस प्रसंग को अपनी आँखों से देखा। आनंदीबाई की कुरूपता का पता सभी को था। अब उसकी कुरूपता बिल्कुल गायब हो चुकी थी। यह देखकर सभी दाँतो तेल ऊँगली दबाने लगे!!

आनंदीबाई तो भावविभोर होकर अपने कृष्ण में ही खोयी हुई थी… उसकी कुरूपता नष्ट हो गयी यह जानकर कई लोग कुतुहलवश उसे देखने के लिए आये।

फिर तो आनंदीबाई अपने घर में बनाये गये मंदिर में विराजमान श्रीकृष्ण में ही खोयी रहतीं। यदि कोई कुछ भी पूछता तो एक ही जवाब मिलताः “मेरे कन्हैया की लीला कन्हैया ही जाने….”

आनंदीबाई ने अपने पति को धन्यवाद देने में भी कोई कसर बाकी न रखी। यदि उसकी कुरूपता के कारण उसके पति ने उसे छोड़ न दिया होता तो श्रीकृष्ण में उसकी इतनी भक्ति कैसे जागती? श्रीकृष्णलीला में कुब्जा के पात्र के चयन के लिए उसका नाम भी तो उसके पति ने ही दिया था, इसका भी वह बड़ा आभार मानती थी।

प्रतिकूल परिस्थितियों एवं संयोगों में शिकायत करने की जगह प्रत्येक परिस्थिति को भगवान की ही देन मानकर धन्यवाद देने से प्रतिकूल परिस्थिति भी उन्नतिकारक हो जाती है, पत्थर भी सोपान बन जाता है

 

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गलत अभ्यास का दुष्परिणाम


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आज संसार में कितने ही ऐसे  अभागे लोग हैं, जो शृंगार रस की पुस्तकें पढ़कर, सिनेमाओं के कुप्रभाव के शिकार होकर स्वप्नावस्था या जाग्रतावस्था में अथवा तो हस्तमैथुन द्वारा सप्ताह में कितनी बार वीर्यनाश कर लेते हैं | शरीर और मन को ऐसी आदत डालने से वीर्याशय बार-बार खाली होता रहता है |उस वीर्याशय को भरने में ही शारीरिक शक्ति का अधिकतर भाग व्यय होने लगता है, जिससे शरीर को कांतिमान् बनाने वाला ओज संचित ही नहीं हो पाता और व्यक्ति शक्तिहीन, ओजहीन और उत्साहशून्य बन जाता है | ऐसे व्यक्ति  का  वीर्य  पतला  पड़ता  जाता है | यदि वह समय पर अपने को सँभाल नहीं सके तो शीघ्र  ही वह स्थिति आ जाती है कि उसके अण्डकोश वीर्य बनाने में असमर्थ हो जाते हैं | फिर भी यदि थोड़ा बहुत वीर्य बनता है तो वह भी पानी जैसा ही बनता है जिसमें सन्तानोत्पत्ति की ताकत नहीं होती |उसका जीवन जीवन नहीं रहता | ऐसे व्यक्ति की हालत मृतक पुरुष जैसी हो जाती है | सब प्रकार के रोग उसे घेर लेते हैं | कोई दवा उस पर असर नहीं कर पाती | वह व्यक्ति जीते जी नर्क का दुःख भोगता रहता है | शास्त्रकारों ने लिखा है :

आयुस्तेजोबलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महदयशः |

पुण्यं च प्रीतिमत्वं च हन्यतेऽब्रह्मचर्या ||

आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, यश तथा पुण्य और प्रीति ये सब ब्रह्मचर्य का पालन न करने से नष्ट हो जाते हैं |’

इसीलिए वीर्यरक्षा स्तुत्य है | ‘अथर्ववेद में कहा गया है :

अति सृष्टो अपा वृषभोऽतिसृष्टा अग्नयो दिव्या||1||

इदं तमति सृजामि तं माऽभ्यवनिक्षि ||2||

अर्थात् ‘शरीर में व्याप्त वीर्य रूपी जल को बाहर ले जाने वाले, शरीर से अलग कर देने वाले काम को मैंने परे हटा दिया है | अब मैं इस काम को अपने से सर्वथा दूर फेंकता हूँ | मैं इस आरोग्यता, बल-बुद्धिनाशक काम का कभी शिकार नहीं होऊँगा |’

और इस प्रकार के संकल्प से अपने जीवन का निर्माण न करके जो व्यक्ति वीर्यनाश करता रहता  है,उसकी क्या गति होगी, इसका भी ‘अथर्ववेद’ में उल्लेख आता है :

रुजन् परिरुजन् मृणन् परिमृणन् |

म्रोको मनोहा खनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः||

यह काम रोगी बनाने वाला है, बहुत बुरी तरह रोगी करने वाला है | मृणन् यानी मार देने वाला है |परिमृणन् यानी बहुत बुरी तरह मारने वाला है |यह टेढ़ी चाल चलता है, मानसिक शक्तियों को नष्ट कर देता है | शरीर में से स्वास्थ्य, बल, आरोग्यता आदि को खोद-खोदकर बाहर फेंक देता है | शरीर की सब धातुओं को जला देता है | आत्मा को मलिन कर देता है | शरीर के वात, पित्त, कफ को दूषित करके उसे तेजोहीन बना देता है |

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रावण की कन्या का विवाह – …. किंतु भावी नहीं मिट सकती


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यदि कोई दूसरे को दोष लगाता है कि ‘अमुक ने मेरे को दुःख दिया।’ तो यह उसकी दुर्बुद्धि है क्योंकि अभिमानपूर्वक किये हुए कर्मरूपी सूत्र में जीव बँधा हुआ है और अपने कर्मों का फल सुख-दुःख के रूप में भोगता है। सुख तथा दुःख देने वाला दूसरा कोई नहीं है। प्रारब्ध कर्म किसी भी प्रकार मिट नहीं सकता।

रावण के जीवन की एक घटना हैः

महाराज जनक रात्रि के तीसरे प्रहर में सिपाहियों के वेश में घूम रहे थे कि खोजें- ‘मेरे राज्य में कौन सुखी और कौन दुःखी है?’ घूमते-घूमते एक जगह देखा कि एक माई का छः मास का बच्चा अपनी माता के स्तन को पुनः-पुनः मुख में डाल रहा है, छोड़ता नहीं है। माता जब छुड़ाने लगी तब रोने लगा।

बालक की इस चेष्टा को देखकर रास्ते से जा रही एक पतिव्रता स्त्री हँसने लगी। सिपाही का वेश बनाकर घूम रहे राजा जनक ने उससे हँसने का कारण पूछा, तब वह कहने लगीः

“मेरे पास इतना अवकाश नहीं है, जो मैं तुम्हें इस बालक और माता की कथा सुनाऊँ।”

राजा ने समय न होने का कारण पूछा, तब वह कहने लगीः

“आज मेरे जीवन का अंतिम दिन है। मैं नदी पर जाकर स्नान करूँगी और पति के लिए जल की गागर भरकर घर पहुँचाऊँगी। फिर मेरे मकान की छत मुझ पर गिर जायेगी और मैं मर जाऊँगी। अंतिम समय मे कुछ ईश्वर-स्मरण कर लूँ इसलिए मुझे जल्दी जाना है। किंतु इतना बता देती हूँ कि वह लड़का और माता दोनों रावण की राजधानी भंगर और उसके बेटे के रूप में जन्म लेंगे तथा बेटे की शादी रावण की कन्या के साथ होगी।” ऐसा कहकर वह चल पड़ी।

राजा जनक उसके पीछे-पीछे गये और बोलेः “मैं राजा जनक हूँ, मैं तेरे से पूछना चाहता हूँ कि तुझे कैसे पता चला कि तेरे पर छत गिरेगी?”

उस स्त्री ने कहाः “मैं पातिव्रत्य धर्म के प्रभाव से भविष्य का सब हाल जानती हूँ।” उस स्त्री ने कहाः “मैं पातिव्रत्य धर्म के प्रभाव से भविष्य का सब हाल जानती हूँ।”

“जब जानती हो तो उससे बच क्यों नहीं जाती, घर जाती ही क्यों हो?”

“भावी अमिट है, भावी के आगे किसी का वश नहीं चलता।”

“किसी राजा-महाराजा, देव-दानव या ईश्वर कोटि में आये हुए, ब्रह्मा, विष्णु, शिवादिकों का वश तो चलेगा, वे तो भावी को मिटा सकते हैं।”

“भावी के आगे किसी का वश नहीं चलता। अनेक उपाय करने पर भी भावी नहीं मिटती। अगर आपको संदेह हो तो जाकर देख लीजियेगा। राजन् ! अब मुझको न बुलाना।”

राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे उसके पीछे-पीछे चलते रहे। उस स्त्री ने नदी में स्नान किया और एक गागर जल भरकर घर की ओर जाने लगी। घर जाकर पति को स्नान के लिए वह गागर देकर स्वयं किसी कार्य विशेष के लिए घर के अंदर गयी तो अचानक ही घर की छत गिर पड़ी। वह उसके नीचे दबकर मर गयी। राजा जनक को उस स्त्री के मरने का बड़ा दुःख हुआ, परंतु भावी के आगे उनका कुछ वश न चला। समय पाकर उसकी बातों को याद कर वे रावण की राजधानी में पहुँचे।

रावण ने राजा जनक का बड़ा सत्कार किया और आने का कारण पूछा तो राजा जनक ने पतिव्रता स्त्री की सब बातें सुनायीं। तब रावण ने सब ज्योतिषगण, देवगण, ऋषिगण, ब्रह्माजी तथा शिव-पार्वती को भी बुलाया और सबसे प्रार्थना की कि इस भावी को मिटाने का कोई उपाय बतायें। तब सबने जवाब दिया कि कर्मरेखा बदलने में हम समर्थ नहीं है। हो सकता है कभी सूर्य भगवान पूर्व को छोड़कर पश्चिम में उदय हो जायें, अग्नि शीतल हो जाये, मेरु पर्वत भी गिर जाये, पत्थर पर फूल पैदा हो जाय…. किंतु भावी नहीं मिट सकती। भाव यह है कि कर्मरेखा कभी नहीं बदल सकती।

तब रावण को अति क्रोध आया और उसने निश्चय किया कि ‘जब लड़की जन्मेगी तो मैं कर्मरेखा लिखनेवाली विधात्री के साथ लड़ाई करूँगा।’ जब समय आया तो लड़की का जन्म हुआ। छठी रात्रि में रावण तलवार लेकर खड़ा रहा। इतने में विधात्री कर्मफल लिखने आयी। रावण ने उसको पूछाः “क्या लिखगी?”

उसने कहाः “पहले मैं कुछ नहीं सकती। जब मैं मस्तक पर कलम रखती हूँ तब अंतर्यामी जैसी प्रेरणा करते हैं, वैसा ही लेख लिखा जाता है। लिखकर पीछे मैं बता सकती हूँ।”

रावणः “अच्छा, मेरे सामने मस्तक पर कलम रखो।”

उसने कलम रखी, अपने आप ही लेख लिखा गया। रावण ने कहाः “पढ़कर सुनाओ।”

विधात्री ने पढ़कर सुनायाः “यह कन्या अति सुंदर, पतिव्रता, सदगुणसम्पन्न व शीलवती होगी किंतु इसकी शादी भंगी के लड़के के साथ होगी, जो तुम्हारे महलों में सफाई करता है।”

रावण को बड़ा क्रोध आया परंतु कर्मफल अमिट है, ऐसा विधात्री ने उसे समझाया और शांत किया।

विधात्री के चले जाने के बाद रावण को फिर क्रोध आया। उसने भंगी के लड़के को मँगवाया जो कि छः मास का था। रावण ने बच्चे को मार डालने का निश्चय किया परंतु बिगड़ उठी और प्रजाजन कहने लगेः “बिना अपराध बच्चे को न मारें, चाहे देश निकाला दे दें।’

रावण ने उस बालक को जहाज पर चढ़ाकर समुद्रपार किसी जंगल में छुड़वा दिया, निशान के लिए लड़के के पैर की अंगुली कटवा दी। उस जंगल में किसी भी प्रकार की बस्ती न थी। अतः यह विचार किया कि यह बालक वहीं मर जायेगा। परंतु दैव उसका रक्षक है।

अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति।

जीवितं नाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति॥

अर्थात् मनुष्य से रक्षा न किया हुआ भी दैव से रक्षा किया हुआ रह सकता है और मनुष्य से सुरक्षित भी दैव से मारा हुआ मारा जाता है। जैसे – ईश्वर से रक्षा किया हुआ बालक वन में भी जीता रहा और दैव का मारा हुआ घर में भी मर जाता है।

जब रावण ने उस बालक को वन में छुड़वा दिया, तब तीन दिन तक बालक भूखा रहा और अपने हाथ का अँगूठा चूसता रहा। ब्रह्मलोक में पुकार पहुँची कि बालक भूखा क्यों रह गया है?

ब्रह्माजी ने विधात्री को आज्ञा दीः “तुम इस बालक को दूध पिलाया करो और इसका पालन करो।”

उस बालक के लिए विधात्री वहाँ आया करती थी तथा उसका अच्छी तरह पालन-पोषण करती और हर प्रकार की उत्तम शिक्षा भी दिया करती थी। उसने बालक को जल पर तैरने की विद्या तथा जहाज बनाना सिखा दिया, शास्त्र-विद्या भी पढ़ा दी। जब बालक चतुर हो गया तथा धर्म में निपुण हो गया और उसकी आयु अठारह वर्ष हो गयी, तब विधात्री ने अपने द्वारा बनाये हुए जहाज पर बिठाकर उसे दूसरे टापू में भेज दिया।

वहाँ का राजा बिना संतान के मर गया था। राजमंत्रियों ने सलाह की और निर्णय किया कि ‘जो पुरुष अमुक दिन प्रातःकाल शाही दरवाजा खुलते ही सबसे पहले मिलेगा, उसी को राजगद्दी पर बिठायेंगे।’

दैवयोग से उस दिन शाही दरवाजा खुलने पर यही युवक पहले मिल गया। राजमंत्रियों ने इसको राजगद्दी पर बिठाकर इसका नाम दैवगति रख दिया। वह विधात्री से शिक्षा पा चुका था, इसलिए प्रजापालन में बड़ा निपुण था। उसका यश चारों दिशाओं में फैल गया।

रावण और उसकी कन्या को दैवगति के बारे में मालूम हुआ तथा उसका चित्र भी उनके पास पहुँच गया। जब उन्होंने चित्र में दैवगति की सुंदरता देखी और दूतों से उसका यशोगान सुना, तब रावण को लगा कि ‘अपनी कन्या का विवाह इसी के साथ कर दें।’ और कन्या का भी मन दैवगति के पास अपने संदेश के साथ भेजा परंतु दैवगति ने शादी के लिए मना कर दिया। फिर रावण स्वयं कन्या को लेकर वहाँ गया और तुरंत उन दोनों की शादी करा दी। प्रसन्न होकर वह लंका में वापस आया और सब देवताओं को बुलाकर उनसे कहाः “आप कहते थे राजकन्या भंगी के लड़के के साथ ब्याही जा सकती है?”

यह सुनकर देवताओं ने कहाः “आपने भंगी के लड़के के पैर में एक निशान किया था। दैवगति के पैर पर उसकी जाँच करें।”

निशान देखने पर दैवगति भंगी का ही लड़का पाया गया !

तब देवताओं ने रावण को समझाया कि कर्मरेखा कभी नहीं मिटती।

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सत्यनिष्ठा का चमत्कार


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छत्तीसगढ़ की एक घटना है। रायपुर के पासवाले स्थानों में पिंडारा जाति के डकैतों का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि वे गाँव-के-गाँव लूट लेते थे। उनका आतंकवादियों की नाईं बड़ा संगठन बन गया था। डाकू अभयसिंह के नेतृत्व में वे डाका डालते थे। उस समय का राजा इन डकैतों से लोहा लेने में अपने को असमर्थ मानने लगा था।

मंत्रियों ने राजा से कहाः “राजा साहब ! हो सकता है रायपुर के पास वाले नगर पर पिंडारा डाकू कभी भी कब्जा कर लें, क्योंकि उनकी संख्या और शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अपने सिपाही और अमलदार उनसे मात खाकर वापस आ रहे हैं।”

राजा ने मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श किया और आखिर यह तय हुआ कि वे डाकू किस समय व कहाँ इकट्ठे होते हैं तथा किस समय अचेत और लापरवाह होते हैं, इसका पता लगाया जाय तथा जब वे अचेत हों तब उन पर हमला बोल दिया जाय। यह पता लगाने के लिए राज-पुरस्कार भी घोषित किये गये लेकिन इस दुष्कर कार्य के लिए कोई तैयार न हुआ, सभी सिर झुकाकर बैठे रहे।

उस राज्य में ओंकार का जप करने वाले और गुरुमंत्र का आश्रय लेने वाले एक दुबले-पतले ब्राह्मण रहते थे, जिनका नाम था रूद्रदेव। उन्होंने संकल्प किया कि ‘मैं समाज का शोषण करने वाले इस संगठन का पता लगाऊँगा।’ वे चल पड़े और यात्रा करते करते उन डाकुओं के क्षेत्र में जा पहुँचे। वे थक गये थे, इसलिए एक पीपल के पेड़ के नीचे सो गये। कुछ समय नींद लेकर उठे और थोड़ी देर शांत भाव से बैठे। इतने में डाकू अभयसिंह वहाँ से गुजरा। रूद्रदेव को देखकर वह बोलाः “ऐ ! यहाँ क्यों पड़े हो और कहाँ से आये हो ?”

सामने वाले व्यक्ति का वेश देखकर रूद्रदेव समझ गये कि यह कोई डाकू है। उन्होंने शांतस्वरूप ईश्वर में गोता मारा और सोचने लगे, ‘अब सत्य का ही सहारा लेंगे।’ उन्हें सत्प्रेरणा मिली।

रुद्रदेव ने कहाः “भैया ! मैं पिंडारों के स्थान का रास्ता जानना चाहता हूँ।”

तब अभयसिंह चौकन्ना होते हुए बोलाः “ऐं….! पिंडारों का स्थान ?”

रूद्रदेवः “हाँ।”

अभयसिंहः “मुझे किसी जरूरी काम से जाना है, नहीं तो मैं तुम्हें उनकी बस्ती और साथ में उनका काम भी अभी-अभी दिखा देता। लेकिन तुम पिंडारों की बस्ती के बारे में क्यों जानना चाहते हो ?”

रूद्रदेव बोलेः “मेरे पास सात अशर्फियाँ हैं, आप चाहे तो इन्हें ले लो। चाहो तो ये कपड़े भी उतरवाकर रख लो और मुझे मारना चाहो तो मारो। सच्चाई यह है कि पिंडारों से जनता पीड़ित हो रही है, यह देखकर राजदरबार ने फैसला किया कि उनके स्थानादि के बारे में जानकारी इकट्ठी की जाय लेकिन इस कार्य को करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। जब मुझे राजदरबार में कोई मर्द नहीं दिखा, तब मैंने मर्दों-के-मर्द ईश्वर में गोता मारा। शुभ संकल्प फलित करने वाले उस भगवान ने मुझे प्रेरणा दी और मैंने यह बीड़ा उठाया।”

“ऐं…..!” अभयसिंह का डाकूपना उछला लेकिन रूद्रदेव ब्राह्मण शांत भाव से, ‘ॐ आनंद…. सबमे तू…’ इस भगवदभाव से अभयसिंह की ओर देखते रहे। नजर से नजर टकरायी। हिंसक आँखें अहिंसक अमृत में भीग गयीं।

अभयसिंह बोलाः “ब्राह्मण देवता ! मार डाला तुमने। मैं तुम्हारा बिनशर्ती शरणागत बन गया। गुरु ! चलो, मैं तुम्हारी थोड़ी सेवा कर लेता हूँ, तुम्हें पिंडारों की बस्ती दिखा देता हूँ और वे जहाँ इकट्ठे होते हैं वह जगह भी दिखा देता हूँ।”

अभयसिंह ने रूद्रदेव ब्राह्मण को अपना सारा क्षेत्र दिखाया तथा उन्हें पिंडारों के बारे में जो जानकारी चाहिए थी वह बता दी। फिर रूद्रदेव ने राजदरबार में जाकर सारे रहस्यों का उदघाटन किया, जिसे सुनकर सभी लोग दंग रह गये।

राजा बोलाः “अब पिंडारों पर चढ़ाई के बारे में सोचा जाये।”

इतने में एक हट्टा-कट्टा निर्भीक व्यक्ति आगे आकर बोलाः “मैं पिंडारों का मुखिया अभयसिंह हूँ। इन ब्राह्मण की सत्यनिष्ठा एवं परहित की दृष्टिवाली करूणामयी आँखों ने मुझे बिनशर्ती शरणागत बना लिया है। मैं शरणागत हूँ, मेरा जो कुछ भी है, अब गुरुदेव का है। अब फौज भेजने की क्या आवश्यकता है ?”

राजा ने रूद्रदेव ब्राह्मण के चरणों में सिर झुकाया और कहाः “महाराज ! आपकी सत्यनिष्ठा के आगे मैं नतमस्तक हूँ। आज से मैं आपका शिष्य हूँ और अभयसिंह मेरा सेनापति होगा।”

पतंजलि महाराज का वचन हैः

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्।

‘सत्य में दृढ़ स्थिति हो जाने पर वह क्रिया फल आश्रय बनती है।’ (पातंजल योगदर्शनः 2.36)

रूद्रदेव ब्राह्मण की सत्यनिष्ठा ने डाकुओं से जनता की रक्षा तो की ही, साथ ही अभयसिंह जैसे डाकू एवं पिंडारा जाति का भी कल्याण कर दिया। आज भी पिंडारा जाति के लोगों को कोई कसम खानी पड़े तो वे कहते हैं- ‘रूद्रदेव ब्राह्मण के चरणों की सौगंध अगर मैंने ऐसा किया हो तो…..’ अगर कोई पिंडारा रूद्रदेव को साक्षी रखकर झूठी कसम खाता है तो उस पर कदुरती आपदाएँ आ पड़ती हैं।

रूद्रदेव ब्राह्मण का शरीर तो नहीं रहा लेकिन उनकी सत्यनिष्ठा तो अभी भी छत्तीसगढ़ के उन इलाकों में सुप्रसिद्ध है। इसलिए बुद्धिमानों को तथा जो स्वयं सुखी होना चाहते हैं व दूसरों का भला करना चाहते हैं उनको सत्य की शरण जाना चाहिए। असत्य बोलने वाला तो स्वयं ही विनाश की ओर जा रहा है, फिर वह दूसरों का क्या भला करेगा।

अभयसिंह डाकू के अंदर कौन था जिसने उसकी क्रूरता को शिष्यत्व में बदल दिया, अशुभ संकल्प को शुभ संकल्प में और हिंसक वृत्ति को अहिंसक वृत्ति में बदल दिया ?… सत्यस्वरूप परमात्मा। जो शुभ संकल्प के रास्ते चार कदम चलता है, परमात्मा और शुभ संकल्पवाले परमात्मा के प्यारे उसके साथ हो जाते हैं। आप सत्य की रक्षा करेंगे, सत्कर्म करेंगे, सज्जनों की रक्षा करेंगे तो ईश्वर की सत्ता आपकी रक्षा करेगी।

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होली उत्सव के पीछे का रहस्य


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Bapuji ke vachan

ये होली उत्सव के पीछे ऋतू-परिवर्तन का रहस्य छुपा है..और विघ्न-बाधाओं को मिटाने की घटनाए भी छुपी है.. और बच्चों को ऋतू-परिवर्तन के समय जो रोग होते उन रोगों को मिटाने का भी इस उत्सव में बड़ा भारी रहस्य है..

रघु राजा ने ये रहस्य नारद जी से उजागर करवाया था..रघु राजा के राज्य में वसंत ऋतू में बच्चे बिमारी से घिर जाते..मन्दाग्नि हो जाती, खान-पान पचता नहीं था..कई बच्चे तो मौत के शिकार हो जाते..तो राजा का कर्तव्य है की प्रजा की तकलीफ राजा की है..कई उपाय खोजने के बाद भी रास्ता नहीं मिला तो देव ऋषि नारद जी से प्रार्थना किये की हमारे राज्य में बच्चों की तंदुरुस्ती लड़खडाने लगी है..कई बच्चे मौत के मुंह में चले गए…तो देव ऋषि नारद जी ने उपाय बताया की इन दिनों में ऐसा उत्सव मनाया जाय..तो उस के बाद बच्चो की अग्नि मंदता दूर हुयी, रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ी..बच्चे,किशोर युवान स्वस्थ रहेने लगे..

ये होली का उत्सव बहुत कुछ हमारे हीत का दे देता है..सूर्य के सीधे तीखे किरण पड़ते तो शरीर में सर्दियों में जमा कफ़ पिघलने लगता है..और जठरा में आ जाता है.. और जठरा मंद हो जाती है..पलाश के फूल मन्दाग्नि निवर्तक है..इसलिए पलाश के फूलों का रंग से, पलाश के पत्तल से, पलाश के दोने से कितने सारे फायदे होते है..राजस्थान में अभी भी ये प्रथा है..महाराष्ट्र में केले के पत्ते पर भोजन करते…इस से चांदी के बर्तन में भोजन करने का लाभ होता है, लेकिन पलाश पत्ते के पत्तल और दोने में भोजन करने से सोने के बर्तन करने का लाभ होता है….अभी तो कागज़ के प्लेटे आ गए..दोने आ गए..इन सब में वो लाभ नहीं होता, जो खाकरे(पलाश) के पत्तल और दोने से होता है..

अब खाकरे के दोने और पत्तल तुम कहा ढूंढ़ने जाओगे?..इसलिए खाकरे(पलाश) के सार स्वरुप केसुड़े के फूल का रंग बना कर तुम्हारे शरीर के रोम कुपो पर ऐसी असर पड़े की वर्ष भर आप की रोग प्रतिकारक शक्ति बनी रहे..खाकरा लीवर को भी मजबूत करता है..लीवर कमजोर होता उन को काविल(जौंडिस ) होता है..जो केसुड़े के फूलों का रंग लगाते उन को काविल(जौंडिस) नहीं होता…मन्दाग्नि भी नहीं होता..मन्दाग्नि के कारण कई बीमारियाँ भी होती है..

सुनामी ने कहर किया तो जापानी बेचारे तबाही के बिच झुंझ रहे है..जी करता है की मैं जा कर वहाँ सेवा करू…तन-मन-धन से जापानियों की सेवा का रास्ता हम खोज लेंगे…
नारायण हरी.. हरि ॐ हरि…

इन दिनों में:-

1)नंगे सीर धुप में कभी ना घुमे..

2)नीम के 25-से-40 पत्ते एक काली मिर्च के साथ चबा के खाए और पानी पिए… ये पित्त जन्य रोग और वायु जन्य रोग को विदाय देने की व्यवस्था है..

3) इन दिनों में बिना नमक का भोजन करने का आग्रह रखे..नमक नहीं छोड़ सकते तो कम कर दो..ये नमक से बचने के दिन है..एक महिना नमक कम कर दो..खड़े नमक से घर में पोता मारे तो घर की निगेटिव ऊर्जा चली जाती है..हफ्ते-15 दिन में ऐसा एक बार जरुर किया करे.
4)ऋतू परिवर्तन है तो ट्यूमर और ब्लोकेज जोर मारेगा..कई लोगो की रोग प्रतिकार शक्ति कमजोर होती तो रोग की संभावना बढ़ जाती है..तो घर के मुख्य द्वार पर नीम और आसोपाल के पत्ते का तोरण लगाना भी हीतकारी रहेगा..

सब से बड़ा हीतकारी है अभयदान ! अपने आत्मा का चिंतन करो..

कन्या-दान, गोदान, गोरस-दान, सुवर्ण दान, विद्या दान , भूमि दान, धन दान, अन्न दान आदि अष्ट-प्रकार के दान से भी अभयदान हजार गुना बड़ा है…अभयदान से पता चलता है की ये सुनामी आई, इस से हजार गुना बड़ी सुनामी आये फिर भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती..हम तो सत -चित-आनंद स्वरुप आत्मा है..शरीर को तो कितना भी संभालो सुनामी में नहीं गए तो और किसी ढंग से जानेवाले है.. मकान,शरीर और ये व्यवस्थाये तो देर-सवेर लड़खडाने वाली है..लेकिन इन सारी व्यवस्था के फायदा उठा के आप के सत-स्वभाव, चेतन स्वभाव और आप के आनंद स्वभाव का आप को साक्षात्कार हो जाए!इस से आप परम निर्भीक हो जाओगे!!
ये सूरज बरफ का गोला होकर धरती पर पड़ जाए और धरती उलटी होकर आकाश में उड़ने लगे ..अपन सब निचे गीर जाए तभी भी अपना कुछ नहीं बिगड़ेगा ये साक्षात्कार हो जाता है! 🙂
ये सूर्य जो है ना, ऐसे अरबो अरबो सूरज है एक आकाश गंगा में..इस सब में सब से छोटा सूरज है जो हम देख रहे…फिर भी ये सूरज पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है! सूर्य पे जाकर खड़े होके देखे तो पृथ्वी कितनी लगेगी?13 लाख-वा हिस्सा!! ज़रा-सा..ऐसी कई आकाश गंगा जिस से संचलीत होती है वो तुम्हारा अंतरात्मा चैत्यन्य से तुम्हारा शरीर संचालीत होता है..और वो ही अंतरात्मा की सत-ता, चेतन-ता सब के अन्दर है..

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Hindu

क्या आपको पता है? Astonishing fact about OM mantra. .


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फ्रांस के वैज्ञानिक डॉ. एंटोनी बोविस ने बायोमीटर (ऊजा मापक यंत्र) का उपयोग करके वस्तु, व्यक्ति, वनस्पति या स्थान की आभा की तीव्रता मापने की पद्धति खोज निकाली। इस यंत्र द्वारा यह मापा गया कि सात्त्विक जगह और मंत्र का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि सामान्य, स्वस्थ मनुष्य का ऊर्जा-स्तर 6500 बोविस होता है। पवित्र मंदिर, आश्रम आदि के गर्भगृहों का ऊर्जा-स्तर 11000 बोविस तक होता है। ऐसे स्थानों में जाकर सत्संग, जप, कीर्तन, ध्यान आदि का लाभ ले के अपना ऊर्जा-स्तर बढ़ाने की जो परम्परा अपने देश में है, उसकी अब आधुनिक विज्ञान भी सराहना कर रहा है क्योंकि व्यक्ति का ऊर्जा-स्तर जितना अधिक होता है उतना ही अधिक वह स्वास्थ्य, तंदुरूस्ती, प्रसन्नता का धनी होता है।

ऊर्जा-अध्ययन करते हुए जब वैज्ञानिकों ने ૐकार के जप से उत्पन्न ऊर्जा को मापा तब तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ही न रहा क्योंकि यह ऊर्जा 70000 बोविस पायी गयी। और यही कारण है कि ૐकार युक्त सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा लेकर जो विद्यार्थी प्रतिदिन कुछ प्राणायाम और जप करते हैं, वे चाहे थके-हारे एवं पिछड़े भी हों तो भी शीघ्र उन्नत हो जाते हैं। ૐकार की महिमा से जपकर्ता को सब तरह से लाभ अधिक है। यदि आपके मंत्र में ૐकार है तो लगे रहिये।

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Indian Culture, Satsang

आध्यात्मविद्याः भारत की विशेषताः


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सुकरात तो शरीर छोड़ते-छोड़ते अपना अनुभव लोगों को बताते गये कि शरीर की मृत्यु यह तुम्हारी मृत्यु नहीं, शरीर के जाते हुए भी तुम इतने के इतने ही पूर्ण हो, परन्तु भारत के ऋषि तो आदि काल से कहते आये हैं-

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा ।

आ ये धामानि दिव्यानि तस्युः ।।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् ।

आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।।

तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति ।

नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।।

‘हे अमृतपुत्रों ! सुनो। उस महान परम पुरुषोत्तम को मैं जानता हूँ। वह अविद्यारूप अंधकार से सर्वथा अतीत है। वह सूर्य की तरह स्वयंप्रकाश-स्वरूप है। उसको जानकर ही मनुष्य मृत्यु का उल्लंघन करने में, जन्म-मृत्यु के बंधनों से सदैव के लिए छूटने में समर्थ होता है। परम पद की प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है।’

(श्वेताश्वतरोपनिषद्)

यह कोई वेद-उपनिषद् काल की बात है, उस समय के ऋषि चले गये और अब नहीं हैं…. ऐसी बात नहीं है। आज भी ऐसे ऋषि और ऐसे संत हैं जिन्होंने सत्य की अनुभूति की है। अपने अमरत्व का अनुभव किया है। इतना ही नहीं बल्कि दूसरों को भी इस अनुभव में उतार सकते हैं। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि रमण इत्यादि ऐसे ही तत्त्ववेत्ता महापुरुष थे। और आज भी ऐसे महापुरुष जंगलों में और समाज के बीच में भी हैं। यहाँ इस स्थान पर भी हो सकते हैं। परन्तु उनको देखने की आँख चाहिए। इन चर्मचक्षुओं से उन्हें पहचानना मुश्किल है। फिर भी जिज्ञासु और मुमुक्षु वृत्ति के लोग उनकी कृपा से उनके बारे में थोड़ा संकेत यह इशारा पा सकते हैं।

 

 

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